सुबह का वह सूरज, हल्का सा कुहरा, धीरे धीरे चलति हवा, दस्व्वे माले पर खड़ा सोचता ही रहा कि हर इन्सान को यह दुन्य कितनी अलग सी दिखाई पड़ती है। यहाँ से दूर सड़के गाड़ियों के साथ आसमान में लुप्त होती हुई लम्बी लम्बी इमारतों की तो अपनी ही एक धुन बनी हुई है जो आकाश से धरती तक एक कोरे स्थान पर उकेरे हुए लगते है.
परदे हटे हुए है, रौशनी घर के हर छेद से अन्दर घुसने की कोशिश कर रही है, घडी की सुई सालोन तक चलने के बावजूद भी धीमी नहीं होती और सड़कों पर गाड़ियों ही हुनकर इतनी दूर तक कानों में सुनाई देती है, पोहे की नमकीन मटर मुह में ऐसे टुटके घुलते हि' एक अलग भरपूर एहसास जगाते है.
पर इसके आगे अगर हम देखे तो सुभह सब अपने कार्य में इतने व्यस्त होते है कि, ठंढ कि वह मीठी चाय जो हवा में अपनी मिठास घोल देती है, उसका स्वाद भी ठीक से नहीं ले पाते क्योकि बचों की बस घर के सामने आकर बस हमारे बचों का का नाम चिल्लाता है, जिसके शर्म की वजह से हम सारा कम छोड़ बस उन्हें तैयार करने में लग जाते है, और भी इस चक्कर में हम उन्हें डांट भी खा लेते है चुप चाप, क्यूँ की वेह भी अब इस दुनिया की दस्तूर को कुछ ही समय में समझ चुके है और यह है भी आसन इस दुनिया में हमे बस घुलना होता है। कुछ और नहीं करना और अगर किया तो बस दुसरो की नज़र हमपर होती है.
वैसे बात यह है की गाड़ी वन आज जल्दी आया था, बच्चे तैयार नहीं थे और शर्म के मारे हमने उन्हें दांत दिया पर अब वे भी समझ जाते है, पर अब फिर से दिन की भगा दूरी में तो सुबह की चाय रह ही गई।
अरे मैं तो यह भी भूल गया था, मुझे भी तो अभी देर हो रही है, तैयार होना है, कम करना जाना है.
परदे हटे हुए है, रौशनी घर के हर छेद से अन्दर घुसने की कोशिश कर रही है, घडी की सुई सालोन तक चलने के बावजूद भी धीमी नहीं होती और सड़कों पर गाड़ियों ही हुनकर इतनी दूर तक कानों में सुनाई देती है, पोहे की नमकीन मटर मुह में ऐसे टुटके घुलते हि' एक अलग भरपूर एहसास जगाते है.
पर इसके आगे अगर हम देखे तो सुभह सब अपने कार्य में इतने व्यस्त होते है कि, ठंढ कि वह मीठी चाय जो हवा में अपनी मिठास घोल देती है, उसका स्वाद भी ठीक से नहीं ले पाते क्योकि बचों की बस घर के सामने आकर बस हमारे बचों का का नाम चिल्लाता है, जिसके शर्म की वजह से हम सारा कम छोड़ बस उन्हें तैयार करने में लग जाते है, और भी इस चक्कर में हम उन्हें डांट भी खा लेते है चुप चाप, क्यूँ की वेह भी अब इस दुनिया की दस्तूर को कुछ ही समय में समझ चुके है और यह है भी आसन इस दुनिया में हमे बस घुलना होता है। कुछ और नहीं करना और अगर किया तो बस दुसरो की नज़र हमपर होती है.
वैसे बात यह है की गाड़ी वन आज जल्दी आया था, बच्चे तैयार नहीं थे और शर्म के मारे हमने उन्हें दांत दिया पर अब वे भी समझ जाते है, पर अब फिर से दिन की भगा दूरी में तो सुबह की चाय रह ही गई।
अरे मैं तो यह भी भूल गया था, मुझे भी तो अभी देर हो रही है, तैयार होना है, कम करना जाना है.